भारत देश में कितने प्रकार की जातियां निवास करती हैं?
हेलो आज हम इस आर्टिकल अपने भारत देश में जातियों के बारे में जानेगे तो आप हमारे साथ बने रहे सुर से लेकर आखिर तक तो आइये शुरू करे
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6000 से अधिक। इनमें से ज़्यादातर को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल किया गया है, पर अभी भी कुछ ऐसे समूह बचे है जिन्हें एससी/एसटी लिस्ट में शामिल किए जाने पर कार्य अभी सरकार द्वारा जारी है।
कुल जातियो की सख्या:
भारत देश में जाति और उपजातियों की सख्या बताना बहुत ही ज्यादा मुश्किल है श्रीधर केतकर के अनुसार केवल ब्राह्मणों की 800 से अधिक अंतर्विवाही जातियाँ हैं। और ब्लूमफील्ड का मत है कि ब्राह्मणों में ही दो हजार से अधिक भेद हैं। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार, जो जातिगणना की दृष्टि से अधिक शुद्ध मानी जाती है, भारत में उनकी संख्या 2378 है। डॉ॰ जी. एस. घुरिए की प्रस्थापना है कि प्रत्येक भाषाक्षेत्र में लगभग दो सौ जातियाँ होती हैं, जिन्हें यदि अंतर्विवाही समूहों में विभक्त किया जाए तो यह संख्या लगभग 3,000 हो जाती है।
भारत में कुल कितने प्रकार की जाति है
हिंदू धर्मशास्त्रों ने पूरे समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णो में विभक्त किया है।
भारत में कौनसी सी जाति सर्वाधिक रहती है
भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार, भील सबसे अधिक जनसंख्या वाले जनजाति है जिसमें कुल जनसंख्या 4,618,068 है, जो कुल एसटी आबादी का 37.7 प्रतिशत है। दूसरा सबसे बड़ा जनजाति है, जिसकी जनसंख्या 4,357, 9 18 है जो 35.6 प्रतिशत है।
सभी जातियो की उतप्ति
प्राचीनतम भारतीय धर्म ग्रंथों में जाति का कोई सबूत नहीं मिलता है। जाति की उत्पत्ति के कारण और काल के विषय में अनेक मत हैं जो सब अनुमान पर आधारित हैं। अनेक विद्वानों का मत है कि श्वेतवर्णं विजेता आर्यो ओर श्यामवर्ण विजित अनार्यो के संघर्ष से आर्य और दास दो जातियों का उदय हुआ और कालक्रम में वर्णसांकर्य, धर्म, व्यवसाय, श्रमविभाजन, संस्कृति, प्रवास तथा भौगोलिक पार्थक्य से हजारों जातियाँ उत्पन्न हुईं। दूसरा प्रबल मत है कि जाति का उदय अनार्य समाज में आर्यो के आगमन से पहले हो चुका था और आर्यो के आगमन ने उसमें अपना योगदान किया। इस मत के समर्थकों का कहना है कि 'जीवतत्ववाद' 'अभिनिषेध' (टैबू) और जादू आदि की भावनाओं से प्रभावित विभिन्न समूह जब एक दूसरे के संपर्क में आए तो वे अपने विश्वास, संस्कृति, प्रजापति, धार्मिक कर्मकांड आदि के कारण एक दूसरे से पृथक् बने रहे। क्योंकि अनेक जातीय समूहों का विश्वास था कि खाद्य पदार्थो तथा व्यवसायिक उपकरणों पर परकीय प्रभाव अनिष्टकारी होता है। अत: छुआछूत और अंतर्विवाह (सजातीय विवाह) संयुक्त समाज के अंग बने। संयोग से जाति को कर्मवाद का आधार भी मिल गया। व्यवसाय, क्षेत्रीयता, वर्णसांकर्य आदि अनेक तत्वों ने उसे प्रभावित, परिवर्तित और दृढ़ किया। आर्यो के आगमन ने इसे नया रूप दिया और जातिप्रथा आर्यो में भी प्रविष्ट हुई। वैदिक साहित्य के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रारंभ में भारतीय आर्यो में तीन वर्ग थे जो समस्त संसार के आर्यो की विशेषता थी और जो जातियों से मूलत: भिन्न थे।
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