भारत देश में कितने प्रकार की जातियां निवास करती हैं?

 हेलो आज हम इस आर्टिकल अपने भारत देश में जातियों के बारे में जानेगे  तो आप हमारे साथ बने रहे सुर से लेकर आखिर तक तो आइये शुरू करे 


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एक गाँव में स्थित परिवारों का ऐसा समूह वास्तव में अपनी बड़ी जातीय इकाई का अंग होता है जिसका संगठन तथा क्रियात्मक संबंधों की दृष्टि से एक सीमित क्षेत्र होता है, जिसकी परिधि सामान्यत: 20-25 मील होती है। उस क्षेत्र में जातिविशेष की एक विशिष्ट आर्थिक तथा सामाजिक मर्यादा होती है जो उसके सदस्यों को, जो जन्मना होते हैं, परम्परा से प्राप्त होती है। यह जातीय मर्यादा जीवन पर्यंत बनी रहती है और जातीय धंधा छोड़कर दूसरा धंधा अपनाने से तथा आमदनी के उतार चढ़ाव से उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह मर्यादा जातीय-पेशा, आर्थिक स्थिति, धार्मिक संस्कार, सांस्कृतिक परिष्कार और राजनीतिक सत्ता से निर्धारित होती है और निर्धारकों में परिवर्तन आने से इसमें परिवर्तन भी संभव है। किंतु एक जाति स्वयं अनेक उपजातियों तथा समूहों में विभक्त रहती है। इस विभाजन का आधार बहुधा एक ही पेशे के अंदर विशेषीकरण के भेद प्रभेद होते हैं। 

किंतु भौगोलिक स्थानांतरण ने भी एक ही परंपरागत धंधा करनेवाली एकाधिक जातियों को साथ साथ रहने का अवसर दिया है। कभी कभी जब किसी जाति का एक अंग अपने परंपरागत पेशे के स्थान पर दूसरा पेशा अपना लेता है तो कालक्रम में वह एक पृथक्‌ जाति बन जाता है। उच्च हिंदू जातियों में गोत्रीय विभाजन भी विद्यमान हैं। गोत्रों की उपायोगिता मात्र इतनी ही है कि वे किसी जाति के बहिविवाही समूह बनाते हैं। और एक गोत्र के व्यक्ति एक ही पूर्वज के वंशज समझे जाते हैं। यह उपजातियाँ भी अपने में स्वतंत्र तथा पृथक्‌ अंतविवाही इकाइयाँ होती हैं और कभी कभी तो बृहत्तर जाति से उनका संबंध नाम मात्र का होता है। इन उपजातियों में भी ऊँच-नीच का एक मर्यादाक्रम रहता है। उपजातियाँ भी अनेक शाखाओं में विभक्त रहती है और इनमें भी उच्चता तथा निम्नता का एक क्रम होता है जो विशेष रूप से विवाह संबंधों में व्यक्त होता है।


 जातियां निवास करती हैं?

 6000 से अधिक। इनमें से ज़्यादातर को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल किया गया है, पर अभी भी कुछ ऐसे समूह बचे है जिन्हें एससी/एसटी लिस्ट में शामिल किए जाने पर कार्य अभी सरकार द्वारा जारी है।


 कुल जातियो की सख्या:

भारत देश में  जाति और उपजातियों की सख्या बताना बहुत ही ज्यादा मुश्किल है श्रीधर  केतकर के अनुसार केवल ब्राह्मणों की 800 से अधिक अंतर्विवाही जातियाँ हैं। और ब्लूमफील्ड का मत है कि ब्राह्मणों में ही दो हजार से अधिक भेद हैं। सन्‌ 1901 की जनगणना के अनुसार, जो जातिगणना की दृष्टि से अधिक शुद्ध मानी जाती है, भारत में उनकी संख्या 2378 है। डॉ॰ जी. एस. घुरिए की प्रस्थापना है कि प्रत्येक भाषाक्षेत्र में लगभग दो सौ जातियाँ होती हैं, जिन्हें यदि अंतर्विवाही समूहों में विभक्त किया जाए तो यह संख्या लगभग 3,000 हो जाती है। 


भारत में कुल कितने प्रकार की जाति है 

आज़ादी के बाद के भारतीय संविधान में भी इस औपनिवेशिक व्यवस्था को बनाए रखा गया. इसके लिए संवैधानिक (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 जारी किया गया, जिसमें भारत के 29 राज्यों की 1108 जातियों के नाम शामिल किये गए थे

 

हिंदू धर्मशास्त्रों ने पूरे समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णो में विभक्त किया है।


भारत में कौनसी सी जाति सर्वाधिक रहती है 

भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार, भील ​​सबसे अधिक जनसंख्या वाले जनजाति है जिसमें कुल जनसंख्या 4,618,068 है, जो कुल एसटी आबादी का 37.7 प्रतिशत है। दूसरा सबसे बड़ा जनजाति है, जिसकी जनसंख्या 4,357, 9 18 है जो 35.6 प्रतिशत है।


सभी जातियो की उतप्ति 

प्राचीनतम भारतीय धर्म ग्रंथों में जाति का कोई सबूत नहीं मिलता है। जाति की उत्पत्ति के कारण और काल के विषय में अनेक मत हैं जो सब अनुमान पर आधारित हैं। अनेक विद्वानों का मत है कि श्वेतवर्णं विजेता आर्यो ओर श्यामवर्ण विजित अनार्यो के संघर्ष से आर्य और दास दो जातियों का उदय हुआ और कालक्रम में वर्णसांकर्य, धर्म, व्यवसाय, श्रमविभाजन, संस्कृति, प्रवास तथा भौगोलिक पार्थक्य से हजारों जातियाँ उत्पन्न हुईं। दूसरा प्रबल मत है कि जाति का उदय अनार्य समाज में आर्यो के आगमन से पहले हो चुका था और आर्यो के आगमन ने उसमें अपना योगदान किया। इस मत के समर्थकों का कहना है कि 'जीवतत्ववाद' 'अभिनिषेध' (टैबू) और जादू आदि की भावनाओं से प्रभावित विभिन्न समूह जब एक दूसरे के संपर्क में आए तो वे अपने विश्वास, संस्कृति, प्रजापति, धार्मिक कर्मकांड आदि के कारण एक दूसरे से पृथक्‌ बने रहे। क्योंकि अनेक जातीय समूहों का विश्वास था कि खाद्य पदार्थो तथा व्यवसायिक उपकरणों पर परकीय प्रभाव अनिष्टकारी होता है। अत: छुआछूत और अंतर्विवाह (सजातीय विवाह) संयुक्त समाज के अंग बने। संयोग से जाति को कर्मवाद का आधार भी मिल गया। व्यवसाय, क्षेत्रीयता, वर्णसांकर्य आदि अनेक तत्वों ने उसे प्रभावित, परिवर्तित और दृढ़ किया। आर्यो के आगमन ने इसे नया रूप दिया और जातिप्रथा आर्यो में भी प्रविष्ट हुई। वैदिक साहित्य के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रारंभ में भारतीय आर्यो में तीन वर्ग थे जो समस्त संसार के आर्यो की विशेषता थी और जो जातियों से मूलत: भिन्न थे।

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