बिहार में कौन सी जाति सबसे शक्तिशाली है ?
हेलो दोस्तों आज हम इस आर्टिकल में आप को बिहार के सबसे शक्तिशाली जाती के बारे में बात करे तो हमारे साथ बने रहे
बिहार का इतिहास ही जातिवादी बुनियाद पर टिका हुआ एवं बना हुआ है. शक्ति प्रदर्शन किसी भी जाती के लिए आम बात है. इस प्रश्न का उत्तर साफ़ शब्दों में नहीं दिया जा सकता है. सच पूछिए तो कोई किसी से कम नहीं है और ना ही अब सामंती प्रथा है.
आप सभी जातियों में देखेंगे की दो वर्ग में बंट चुके हैं. पहला साहूकार और दूसरा मजदूर वर्ग. ऊंची जातियों में भी आपको ये दोनों मिल जायेंगे और नीची जाती में भी. क्षेत्र के हिसाब से अलग अलग जातियों का बर्चास्व रहा. जैसे अगर आप मध्य बिहार में चले जाए तो भूमिहार और राजपूत जाती का दबदबा रहा लेकिन अगर मैं दक्षिण बिहार की बात करता हूँ तो राजपूत और यादवों का बर्चश्व रहा.
जहानाबाद, औरंगाबाद, गया, नवादा में खुनी संघर्ष का कुछ सालों से विराम हो चूका है लेकिन आप बर्चास्व की बात करें तो नकली माओवाद और सामंतवाद की लड़ाई में भूमिहारों का अंततोगत्वा दबदबा रहा. चम्पारण, बेतिया, सीतामढ़ी, छपरा, मोतिहारी, जमुई, बांका की बात करू तो राजपूतों का हमेशा बर्चश्व रहा. पूर्णिया, किशनगंज, अररिया, मधेपुरा, सहरसा, सुपौल यानि उत्तर पूर्वी बिहार की बात करूँ तो यादव, मुसलमान बर्चस्व में रहे. भागलपुर, बेगुसराई, मुजफ्फरपुर, की बात करो तो भूमिहारों का बर्चस्व रहा. खगरिया, नालंदा, हाजीपुर, वैशाली की बात कीजिये तो कुर्मी, यादवों का बर्चस्व रहा.
अगर मैं डिटेल्स में चला जाऊं तो १ लाख वर्ड्स में बात पूरी हो शायद. फिर भी आप ये नहीं कह सकते हैं की मुख्य रूप से किस जाती का बर्चस्व रहा? पहले वाली बात रहती तो मैं बोलता भूमिहार और राजपूत. लेकिन अब वो बात नहीं रही. सभी सबल हैं, और सबों में निर्बल हैं.
भारत में कौन सी जाति पहले से ही है?
बिहार में किसी एक जाति का दबदबा एक मिथक है।
चलिए हम मधेपुरा का उदाहरण लेते हैं। कहा जाता है की रोम पोप का और मधेपुरा गोप का । फिर भी यहाँ यादव समाज की आबादी सिर्फ 33% है। एक अन्य उदाहरण मोकामा है जहां भूमिहार समाज की आबादी 35% से अधिक नहीं हो सकती है। आप नालंदा को ही देख लीजिए वहाँ भी कुर्मी समाज एक तिहायी से अधिक नहीं होगा । आपको ऐसा कोई जिला या शहर नहीं मिलेगा जिसकी बिहार में 35% आबादी हो। और 30% संख्या भी बहुत दुर्लभ है। इसलिए, अधिकांश क्षेत्रों में कई जातियां होंगी जिनकी जनसंख्या प्रतिशत लगभग 25% या उससे कम होगी।
पूरे बिहार में यादवों की आबादी 14–15% है । तथाकथित ऊंची जाति का कोई भी प्रतिशत 7-8% से परे नहीं है और गैर यादव ओबीसी, एमबीसी और दलित कई जातियों में बिखरे हुए हैं। मुसलमान भी 17% पर हैं। वर्चस्व सत्ता से आता है और मंडल युग के बाद बिहार की राजनीति से उच्च जातियों का वर्चस्व समाप्त हो गया है।
1990 के दशक में और 2000 के दशक की शुरुआत से राजद के पतन ने यह सुनिश्चित कर दिया कि यादव भी प्रभावी नहीं हैं। अन्य ओबीसी जैसे कुर्मी और कोइरी समाज के पास बिहार जैसे विशाल राज्य पर हावी होने के लिए संख्यात्मक शक्ति नहीं है। यही हाल विभिन्न दलित समुदायों का है। बिहार के उत्तर पूर्वी हिस्से में मुसलमान अधिक केंद्रित हैं।
अब तक, बिहार में कोई भी जाति प्रमुख नहीं है और आपको हर प्रमुख जाति के अपने अपने छोटे छोटे प्रभाव क्षेत्र है ।
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